कहीं बस्ती उजाड़ कर जंगल बसा दिया, कहीं जंगल उजाड़ कर बस्ती बसा दिया .....। अकबरनगर विस्थापितों का छलका दर्द
कहीं बस्ती उजाड़ कर जंगल बसा दिया, कहीं जंगल उजाड़ कर बस्ती बसा दिया .....।
अकबरनगर विस्थापितों का छलका दर्द
तबीयत बड़ी अफसुरदा थी जब हम उस रास्ते से गुजर रहे थे जहां अभी डेढ़ महीना पहले बसे एक खुशनुमा इलाके को ज़मीदोज़ कर दिया गया था। कदम बढते जा रहे थे, जी न चाहा कि नजर उठा कर सड़क के उस ओर देखूं, लेकिन न जाने पुराने मंजर को खोजती हमारी नजरें बेसाख्ता ही उस ओर चली गईं। जमीदोज कर दिए गए आशियाने। मल्बा भी अब तेजी से सपाट किया जा चुका था, इस लिए कि सूबे के सदर-ए-मोहतरम ने बस्तियां उजाड़ के उस इलाके को हरा भरा करने का हुक्म दिया था, उनकी अपील थी कि एक पेड़ मां के नाम लगाया जाए।
कुछ पेड़ नजर आए, कुम्हलाए, उनकी पत्तियां झुकी हुई, उदास से पेड़ जो अभी कुछ रोज पहले ही आनन-फानन में लगाए गए थे, हम कह नहीं सकते, लेकिन शायद वो इस लिए उदास थे कि किसी मां की बददुआ उन पेड़ों पर मंडरा रही थी।
अनमना सा भाव लिए हम आगे बढते चले गए। साथियों से मुलाकात हुई और हम चारों मधु गर्ग, कांती, मीना और हम उस जगह पहुंच गए जहां इन्ही अकबर नगर के बाशिंदों को शहर से 35 किलोमीटर दूर एक बियाबान में फेंक दिया गया था। हमारा ऑटो आगे बढता जा रहा था, उन रास्तों पर बढ़ते हुए बशीर बद्र की लिखी वो लाइनें बार-बार हमारे कलेजे पर चोट कर रही थीं, "लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में , वो तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।" खैर तरस ही खाते तो जमीन के सौदागरों का साथ कैसे देते सदर-ए-मोहतरम।
वहां पहुंचे तो सुमन और बुशरा ने हमारी रहनुमाई की। एक छोटा सा कमरा जिसे आप बावर्ची खाना कहें या कमरा, उसी में पास से मांग कर एक चटाई और दो कुर्सियां आईं, हम चारों लोग बैठ गए।
उस गम की दास्तान जो आंसुओं से सराबोर थी, उसे सुनते हुए हम कुछ बोलने की हिम्मत न जुटा सके। इतनी समझदारी भरी बातें जिसके लिए किसी दस्तावेज पढने की जरूरत न थी। वो सारा सच जो एक कम, एक सैकड़ा साल का था उन्होने जबानी हमें बता दिया। गुफ्तगू के दरमियां कभी हिम्मतवर औरतों की भी सिसकियां निकल पड़तीं। फिर वो अपने को संभालती और दूसरी बहनों के कंधे पर हाथ रख उन्हें सहारा देतीं।
कितना बड़ा था आप का घर वहां? खामोशी जो थोड़ी तवील हो गई थी उसे तोड़ते हुए मधु गर्ग ने पूछने की आहिस्ता लहजे में जुर्रत की। जी दो मंजिला 6 कमरे का कमान था, ऐसा सुमन पांडे ने बताया। आगे वो कहती हैं घर में जरूरत का हर सामान मौजूद था, और अब ये एक कमरे का मकान 9 लोगों का परिवार। यहां पीने के पानी की बड़ी मुश्किल है, ताजा पानी पीने के लिए भर लेते लेकिन इन घरों में ताजे पानी के लिए कोई टोटी ही नही लगाई गई है। एक बार वो सीमेंट की टंकी भर गई तो फिर उसी से पानी पीना है चाहे वो धूप में खौलता हो चाहे उसमें गंदगी हो, हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है। इसी लिए बच्चे यहां बीमार बहुत हो रहे हैं।
बुशरा आगे बताने लगीं कि बिजली का ये आलम है कि 8 से 10 घंटे तक चली जाती है, मोहर्रम के रोज तो दो दिनों तक बिजली ही नहीं आई। इस शिद्दत की गर्मी में दिन-रात काटना मोहाल हो रहा है।
बात रोजगार की आई कई औरतें एक साथ बोल पड़ी, बहन जी हम वहां कोठियों में काम कर लेते थे खाना बनाना, झाडू बर्तन, कपड़े धोना अब यहां हमारे पास कोई रोजगार नहीं है, इसी ब्लाॅक में कल दो लड़कियां जिनके पास खाने को एक दाना नहीं था उनका दुख न देखा गया किसी तरह हम लोगों ने मिल कर उनके लिए खाने का इंतेजाम किया है।
एक नौजवान सी मासूम लड़की बोल पड़ी वहां हम टयूशन पढा लेते थे, अरबी स्कूल में भी पढाते थे, यहां कोई पढ़ने नहीं आता।
दूसरी लड़की ने कहा हमारा तो स्कूल ही छुडवा दिया गया। इतनी दूर जाने का किराया कैसे दिया जाता, अब हम स्कूल नहीं जाते। फिर अकेले हम यहां से स्कूल जा भी नहीं सकते, डर लगता है।
सरला, मिथलेश, संगीता, सईदुन निसां, तालीमुन निसां सब की एक सी कहानी। किसे याद करें और किसे भूल जाएं कहना मुमकिन नहीं। उनकी आंखों से झरते मोटे-मोटे आंसू बेचैन करते रहे, हम सभी इस उम्मीद में उनके पास बैठे रहे और दिलासा देते रहे कि हम आप के सवाल को आगे उठाएंगे जरूर, इतना आप को एतबार दिला सकते है।
अब यहां एक और हैरान कुन बात आप के सामने रखना जरूरी समझते हैं-
घर किसे नहीं मिलेगा-
उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों ने मकान का आवंटन करते हुए एक बात साफ कर दी थी कि जिनके पति नहीं है, जो तलाकशुदा हैं, जिन्हें पति बच्चों सहित छोड़ कर चले गए है उनका कोई पता नहीं है, उन्हें घर नहीं दिया जाएगा। अकबर नगर में 100 के करीब ऐसी लड़कियां थी जिनके पारिवारिक हालात के कारण उनकी शादी नहीं हो पाई थी जो 45 साल से ज्यादा उम्र की थीं, वो औरतें वहीं टयूशन पढाकर, सिलाई कढाई करके, दुकान लगा कर या कोई दूसरा रोजगार करके अपना गुजर कर रही थीं। उन्हें मकान एलाॅट नहीं किया गया। यह एक गंभीर मामला रहा।
इसके अलावा 150 के करीब ऐसी औरतें थीं जिनके पति बरसों पहले बच्चों सहित उन्हें को छोड़कर लापता हो चुके हैं, तलाक देकर चले गए हैं, पति की मौत हो गई है, या उन्होने किसी दूसरी औरत से शादी कर ली है और पहली पत्नी को तलाक भी नहीं दिया है ऐसी औरतों को सरकार ने बसंतकुंज योजना में मकान एलाॅट नहीं किया है। ऐसी महिलाएं जो अब तक आत्मनिर्भर थी, अब काम के अभाव में, और मकान के अभाव में दर बदर भटकने को मजबूर हैं। कोई भाई-भाभी या किसी दूसरे रिश्तेदार या जान पहचान वालों के घर पर रह रही हैं, उनका आत्मसम्मान से अपने घर में रहने का ख्वाब भी पूरा न हो सका। सरकार की निगाह में वह मकान पाने की पात्र नहीं है।
सरकार बेटी पढाओ बेटी बचाओ का नारा देती है, महिला सुरक्षा के लिए खुद को प्रतिबद्ध बताती है, मुस्लिम महिलाओं के लिए तो वक्त-वक्त पर उनका दर्द छलकता ही रहता है। ऐसे तमाम तरह के नारे उछालने के बाद जमीनी हकीकत इतनी भर है कि वो उनको एक अदद मकान तक न दे सकी है। ऐसा कदम सरकार पर सवाल जरूर उठाता है।
मकान मुफ्त नहीं है यह महज़ अफवाह-
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जब अकबर नगर खाली करना शुरू किया और अखबारों में ये झूठी खबर छापी गई कि अकबर नगर में बसे लोगों को सरकार मुफ्त में मकान दे रही है। उनसे किसी किस्म का चार्ज नहीं लिया जाएगा। ये खबर आप ने भी जरूर पढी होगी। लेकिन आप को बता दें कि जितने लोगों को मकान मिला है उनके पुनर्वास के नाम पर उनमें सब से उन मकानों की कीमत वसूली जा रही है। मकान की कीमत है 4 लाख 80 हजार। इसके लिए शुरू में ही उन्हें 1000/- रजिस्ट्रेशन के और 150 रूपये स्टैंप के अदा करने पड़े है। ऐसा सुमन पांडे जी ने भी हमें बताया।
दिया गया मकान 15 साल की किस्त पर है 3300 रुपये और बिजली, पानी सीवर का टैक्स मिलाकर लगभग 5000 रुपये महीना लोगों को अदा करना है, जिनके हाथ में आज 5 सौ रुपये का भी रोजगार नहीं है।
कुछ और अहम सवाल जो औरतें उठाती रहीं-
- हमें यहां मंदिर, मस्जिद, कब्रिस्तान, शमशान भी न दिया सरकार ने। क्या ये हमारी इंसानी जरूरतें नहीं हैं?
- शिक्षा बड़ी समस्या है सरकारी स्कूल है नहीं, प्राइवेट हैं तो बहुत दूर और हमारी हैसियत से बाहर है।
- पास में कोई सरकारी अस्पताल नहीं है, अगर किसी महिला को प्रसव पीड़ा हो जाए तो वो अस्पताल नहीं पहुंच सकती। सरकारी अस्पताल 10 से 15 किलोमीटर दूर है।
- सड़क पर सीवर बह रहा है।
- यहां काम नहीं है।
- बिजली 6 से 8 घंटे नहीं आती।
- राशन भी नहीं मिलता, कोटे का राशन लेने अकबर नगर जाना पड़ता है।
- नौजवानों के पास जो हुनर है उसका यहां इस्तेमाल नहीं, वो बेकार बैठे है।
- ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था ठीक नहीं। सिर्फ एक बस है 801 नं0 वो सुबह-शाम एक चक्कर लगाती है अगर बस छूट गई तो कोई दूसरा सहारा नहीं है।
- कामकाजी और पढाई करने वाली महिलाओं की सुरक्षा नहीं है। डेढ़ महीने में कई घटनाएं यौन उत्पीड़न की हो चुकी हैं।
दर्द कुछ इस तरह भी छलका-
एक महिला ने बताया कि अकबर नगर में उन्होने पर्सनल लोन लेकर मकान बनवाया था जिसकी किस्त हर महीने 27551/- रूपये जा रही थी, अब मकान जमीदोज़ हो गया है लेकिन किस्त जा रही है। पति सरकारी माली हैं। सारा पैसा अब किस्त में ही चला जाता है।
सरकारी स्कूल ने भी नहीं लिया दाखिला बताया कि अब देर हो गई है।
1985 में ब्याह कर अकबर नगर आई थी, 4 कमरे का घर था जिंदगी ठीक से चल रही थी, लेकिन अब तो एक पहाड टूट पड़ा है। कहीं कोई रास्ता नजर नहीं आता अब।
पति बढई का काम करते हैं, आसपास तो काम नहीं है। दूर जाते है काम पर । रोज 200 का पेट्रोल लगता है और 375/- मजदूरी मिलती है।
बुजुर्ग सदमें में हैं। उनमें कई अपने होश खो बैठे हैं, मकान की दीवार छू कर कहते हैं कि ये अकबर नगर नहीं है, हमारा अब आखरी वक्त है हमें अपने घर ले चलो, ताकि हमारा अंतिम संस्कार ठीक से हो सके, हमें चैन की मौत मिल सके।
सुन्नी मुसलमानों की सबसे बड़ी ताजिएदारी लखनऊ में अकबर नगर की ही थी, उसके खत्म होने पर लोग रंजीदा है। बताते हुए उनकी आंखें छलक उठीं।
कुछ घरों की बिजली अकबर नगर का मामला कोर्ट में चलने के दौरान ही सरकार ने दिसंबर में ही काट दी थी, बाकी लोगों की बिजली 6 जून जब गर्मी अपने शबाब पर थी सरकार ने काट दी। बहुुत मिन्नतें करने के बाद भी कनेक्शन नहीं जोड़ा गया। तड़पते, बिलखते लोगों पर पुलिस ने लाठियां भी बरसाई।
यहां एक ब्लाॅक में 48 मकान हैं, हर माले पर पतले-पतले 12 मकान। जिनका प्लास्टर, दरवाजा अभी से ही बहुत जरजर स्थिति में है, ऐसा नहीे लगता कि यह मकान ज्यादा लंबे समय तक चल पाएंगे।
बेदखली के डेढ़ महीने के दौरान वसंत कुंज में बसे लोगों में 13 लोगों की मौत हार्ट अटैक,अवसाद से हो चुकी है। एक दर्जी का काम करने वाले नौजवान मोहम्मद अजीज ने तो तंगी से परेशान होकर फांसी लगाकर आत्महत्या भी कर ली है। इनमें से किसी को भी सरकार ने कोई मुआवजा नहीं दिया।
मुख्यमंत्री ने सदन को अकबर नगर के इन मुद्दों पर गुमराह किया-
झूठ नं0 1-
मुख्यमंत्री ने सदन में कहा कि अकबर नगर 1984 में बसी एक अवैध बस्ती थी, इस लिए अतिक्रमण हटाकर इसे खाली करा दिया गया। अब कुकरैल नाले ने नदी का स्वरूप ग्रहण कर लिया है। और अब उस स्थान पर लखनऊ के सौंदर्यीकरण और पर्यावरण के लिए सौमित्र वन की स्थापना की जा रही है।
सच -
अकबर नगर 1332 फसली यानी 1925 में ही आवासीय भूमि के बतौर राजस्व रिकार्ड में दर्ज है। इसका पुराना नाम मेहनगर, रहीम नगर था। राज्यपाल अकबर अली के नाम पर इसका नाम अकबरनगर कर दिया गया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री और राज्यपाल कार्यालय एवं लखनऊ विकास प्राधिकरण, बिजली विभाग के अकबरनगर के संबंध में तमाम पत्र 70 के दशक के मौजूद हैं। अकबर नगर के निवासी हाउस टैक्स, सीवर टैक्स,वाटर टैक्स,बिजली के बिल का भुगतान करते रहे हैं। यही नहीं अकबर नगर में सांसद,विधायक से लेकर पूर्व सरकारों के प्रतिनिधियों ने विकास कार्य कराए थे।
इस बस्ती को कुकरैल रिवर फ्रंट के डूब क्षेत्र के नाम पर लोकसभा चुनाव के तत्काल बाद सरकार और प्रशासन द्वारा बुलडोज करके तहस-नहस कर दिया गया। जबकि यहां के सैकड़ों निवासियों की इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार रिव्यू पिटीशन पड़ी हुई थी जिनपर सुनवाई और फैसला आना बाकी था।
झूठ न0 2- सरकार कुकरैल नाले को नदी बता रही है।
सच- यह एक गंदा नाला है, जो आज भी देखा जा सकता है।
झूठ नंबर 3- अकबर नगर के लोगों का पर्याप्त पुनर्वास हो गया है।
सच- सच्चाई यह है कि जिन दड़बेनुमा मकानों में लोगों को बसाया गया है। उसका 4 लाख 80 हजार रूपए 15 साल की 3300 प्रतिमाह की दर से कीमत वसूल की जाएगी। वहां बेसिक सुविधाओं बिजली, पीने योग्य पानी, अस्पताल, स्कूल का पूरी तरह से अभाव है। जहां सम्मानजनक जीवन जीने के लिए शिक्षा ,स्वास्थ्य,रोजगार,सफाई जैसी न्यूनतम सुविधाओं की भी बहुत कमी है।
झूठ नंबर 4- लोग वहां आरामदायक जीवन जी रहे हैं।
सच- बेदखली के डेढ महीने के दौरान बसंत कुंज में बसे लोगों में 13 लोगों की मौतें हार्ट अटैक,अवसाद से हो चुकी है। एक नौजवान लड़के अजीज की सिलाई मशीन पुलिस ने जप्त कर ली, आर्थिक परेशानियों से तंग आकर उसी घर में फांसी लगाकर अजीज ने आत्महत्या कर ली। सरकार ने उन लोगों को मुआवजा तक नहीं दिया।
झूठ नंबर 5- सीएम कहते हैं कि कुकरैल नाले ने नदी का स्वरूप ले लिया है। वह इसका उद्गम अस्ती गांव का कुआं बताते हैं।
सच- अस्ती गांव का वह सूखा कुआं आज भी सूखा है वह नदी का उद्गम स्थल कैसे हो सकता है? और कुकरैल नाला अभी भी गंदगी से भरा वैसा ही नाला है जिसकी जांच की जा सकती है।
अकबर नगर को तहस-नहस करने के बाद सरकार व प्रशासन के हौसले अभी काफी बढे हुए नजर आ रहे हैं, ऐसे में उन इलाकों में जहां सरकार ने पहले ही लाल निशान लगवा दिया था उसने अबरार नगर, पंतनगर, खुर्रम नगर, शिवानी विहार, इंद्रप्रस्थ कालोनी, स्कार्पियो क्लब रहीम नगर शामिल हैं, इसके खिलाफ पूरे लखनऊ के नागरिकों के जबरदस्त विरोध के बाद मुख्यमंत्री ने लोगों से वार्ता की और कहा कि अब इस जगह को तोड़ा नहीं जाएगा और लाल निशान भी मिटा दिए जाएंगे। लेकिन विधान सभा में मुख्यमंत्री अपने इस वादे से भी पलट गए और अब फिर से यह बस्तियां सरकार के निशाने पर आ गई है।
इस दौरान सरकार ने यह खुद माना कि वह 35 मीटर रिवर बेड में ही रिवर फ्रंट का निर्माण होगा और 50 मीटर रिवर फ्लड जोन की न तो उसे कोई जरूरत है और न ही उसका कोई प्रस्ताव है। तब आखिर यह सवाल उठता है कि जब उसे 35 मीटर कुकरैल रिवर फ्रंट बनाना था तो आखिर नाले से 500 मीटर दूर अकबर नगर बस्ती को तहस नहस करके वहां के लोगों की जिंदगी को तबाह करने का काम क्यों किया गया ?
उत्तर प्रदेश सरकार के इरादे को पढते रहना आज की बड़ी जरूरत है, उसकी आंखों में गरीब के लिए हिकारत है,उसकी हैसियत कीड़ेमकोड़े से ज्यादा नहीं, वो गरीब को फरेब देकर उसका शिकार नए-नए ढंग से करने पर आमादा है। वो जो मस्नदे इक्तेदार हैं उन्हें अपने खुदा होने का गुमान है। वो कार्पोरेट घराने को जमीने मोहय्या कराने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं, और गरीब का घर उजाड़ कर ही ये कोशिश पूरी हो सकती है।
जरूरत इस बात की है कि हमारी पैनी नजर इस मामले पर बनी रहे और लखनऊ बचाओ संघर्ष समिति इस मुद्दे पर जिस तरह से वादाबंद है उसमें किसी किस्म की रूकावट न आने पाए। तभी हम किसी की आंख से आंसू चुरा सकते हैं, और इंसाफ पाने की इस सख्त लड़ाई में शाना ब शाना खड़े होकर इसे जीत सकते हैं। ऐसा मुमकिन जरूर है।

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