आखिर मैरिटल रेप का क्या है समाधान ?

 आखिर मैरिटल रेप का क्या है समाधान ?

यूॅं तो माना जाता है कि पूरी दुनिया से अब गुलामी का दौर खत्म हो चुका है। हर इंसान आजाद है, उसे किसी के दबाव में रहने को मजबूर नही किया जा सकता। नीग्रो गुलामी के साथ ही गुलामी प्रथा हमेशा के लिए खत्म हो चुकी है। इसके बरक्स विवाह संस्था की अगर पड़ताल की जाए और इस बात की सच्चाई को परखा जाए तो पता चलता है कि डयोढी के भीतर ताकत के कानून का प्रभाव देश के कानून सेे कही ज्यादा है जो गुलामी को बनाए रखने की वकालत करता है। लेहाजा विवाह संस्था गुलामी मुक्त होती नही दिखाई पड़ती। तमाम आंकडे इस बात की तस्दीक भी करते है।

कहा तो ये भी जाता है कि मर्द और औरत गाड़ी के दो पहिए है, लेकिन एक पहिया बैलगाडी का और दूसरा ट्रक का लगा हो तो भला बैलेंस कैसे बन सकता है। पित्रसत्ता के तमाम फरमान एक बच्ची की परवरिश के दरमियां उसका पीछा करते ही रहते है। उसे कमजोर और अपने नियंत्रण में रखने लायक बनाते रहते है।

विवाह इकलौती ऐसी सामाजिक व्यवस्था रह गई है जिसे कई मामलों में बंधक व्यवस्था भी कहा जा सकता है। इनसे बच निकलने के लिए औरत बार-बार जतन करती है, विपरीत परिस्थितियों से मुकाबला करते हुए कई बड़े बदलाव औरतों ने कर ड़ाले है, वो चाहे घरेलू हिंसा का कानून लाना हो, कार्य स्थल पर यौन हिंसा का कानून हो, महिला थाना बनाए जाने की मांग हो, तीन तलाक की लड़ाई हो, महिला आरक्षण बिल का खाका पेश करना हो । औरत के जीवन से जुड़ी चिंता से मुक्ति का मार्ग तलाशने में औरत ने ही हमेशा पहल की है।

चर्चा होते-होते मामला पहुंच गया सुप्रीम कोर्ट-  

इस बार औरतों ने मैरिटल रेप का प्रश्न उठाया है। निश्चित रूप से यह एक अति गंभीर श्रेणी के प्रश्नों में आता है, ऐसे महौल में जहां पत्नी को सम्पत्ति की तरह देखा जा रहा हो, उसके शरीर पर पति का हक और मनमर्जी को रोकने पर कानून मौन हो, उस वक्त में संकटों से भरे इस प्रश्न को अदालत तक ले जाना खासी हिम्मत की बात है। 

सबसे पहले मैरिटल रेप का मामला 2015 में दिल्ली हाई कोर्ट में दायर किया गया था। 2016 में मोदी सरकार ने मैरिटल रेप जैसी किसी भी अवधारणा को सिरे से खारिज कर दिया था,  सरकार ने तब दलील दी थी कि विवाह जैसी पवित्र संस्था को कलंकित करेगा ऐसा कानून। भारत में विवाह एक पवित्र संस्कार है। उसके बाद 2017 में सरकार ने अदालत में एक हलफनामा दाखिल करके यही बात दोहराई थी। 

गुजिष्ता चार सालों में दो बड़े मामले दो हाईकोर्ट में दर्ज किए गए। पहला मामला 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट का था जहां एक पत्नी ने अपने पति द्वारा बनाए गए जबरन संबंध पर दिल्ली हाई कोर्ट में पेटीषन फाइल की थी। जिसे दिल्ली हाई कोर्ट के दो जजों ने 11 मई 2022 को इस पेटीषन पर अलग अलग फैसला दिया। जस्टिस राजीव शकधर ने कहा कि यह अपवाद है इसे रद्द किया जाए, वहीं दूसरे जज जस्टिस सी हरिषंकर ने कहा कि यह असंवैधानिक नहीं है। 

एक दूसरा मामला कर्नाटक हाईकोर्ट में 2023 में आया। जहां एक पति ने पत्नी की तरफ से लगाए गए रेप के आरोपों पर हाई कोर्ट का रूख किया था। 23 मार्च 2023 को कर्नाटक हाईकोर्ट ने पति पर लगाए गए रेप के आरोपों को खारिज करने से मना कर दिया। जस्टिस नागप्रसन्ना की सिंगल बेंच ने इस मामले में कहा था कि तथ्यों के आधार पर इस तरह के यौन हमले/दुष्कर्म के लिए पति को पूरी छूट नहीं दी जा सकती है।   

क्या है मैरिटल रेप ?

पति अपनी पत्नी की मर्जी के बगैर उससे जबरन शारीरिक संबंध बनाता है तो उसे मैरिटल रेप कहा जाएगा, यह परिभाषा महिलाओं पर होने वाली हिंसा के खिलाफ लगातार काम करने वाली महिलाओं ने दी है, इसकी हमारे कानून में न तो कोई परिभाषा है और न ही इसे अपराध माना जाता है। धारा 376 रेप की परिभाषा और सजा का प्रावधान तो करती है लेकिन पत्नी से रेप को वह तभी मानती है जब पत्नी की उम्र 12 साल से कम हो, ऐसे में पति पर जुर्माना व दो साल तक की सजा का जिक्र है। इसे ऐसे समझते है कि रेप कानून में सेक्स के लिए सहमति देने की उम्र तो 16 साल है लेकिन 12 साल से बड़ी उम्र की पत्नी की सेक्स के लिए सहमति या असहमति का कोई माने ही नही। 

1 जुलाई 2024 को सरकार ने भारत में तीन नए कानून पारित किए उनके तहत रेप का पुराना कानून प्च्ब् की धारा 375 की जगह भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 में बदल गया है, लेकिन मैरिटल रेप को लेकर कोई बदलाव नहीं है, खाली धारा का नंबर बदल गया है। 

दूसरी तरफ निजी कानूनों पर गौर करे तो पाते है कि हिंदू विवाह अधिनियम में यह माना गया है कि सेक्स के लिए इनकार करना कू्ररता है और इस आधार पर तलाक तक मांगा जा सकता है। मुुस्लिम निजी कानून मेे भी यौवनावस्था की आयु को ही विवाह की आयु माना गया है, इसमें सेक्स के लिए सहमति या असहमति का प्रश्न ही नही है। हदीसों में पति को सेक्स के लिए इनकार करने पर जल्ती लकड़ी से पीट कर सजा देने तक का उल्लेख मिलता है। 

महिला संगठनों के बीच तो यह बहस एक अरसे से जारी है, महिला हिंसा के मामलों में दखल देने वाले संगठनों के पास ऐसे मामले आते रहते है जिनमें महिलाएं विवाह में जबरन रिश्ता बनाना, सबक सिखाने के लिए यौन हिंसा करना, सेक्स के लिए न कहने पर पति द्वारा तरह-तरह से प्रताडित करना, कुत्ते के बच्चों से पत्नी का स्तन कटवाना, स्वयं स्तन काट देना, ब्लू फिल्में देख पत्नी से उसी प्रकार के फूहड़ कृत्य करने को बाध्य करना, योनि को चोटिल करना अदि अनेको प्रकार के उदाहरण सामने आ चुके है। 

मैरिटल रेप पर यह चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर यूॅं ही नही उठी, उत्तर प्रदेश की एक 21 वर्षीय युवती  ने बताया कि विवाह के बाद जब वह प्रारंभ में पति से संबंध बनाने में असहज हो रही थी तो पति ने उसे तरह-तरह से प्रताडित किया, बंद करमे में उस पर ऐसी हिंसा की गई जिससे वह दहशत में आ गई। उसके साथ बलात्कार किया गया, और इस मसले पर मायका व ससुराल किसी पक्ष ने उसका साथ नही दिया। उनका कहना था कि यह तो होता ही है। अंत में कुछ लोगों की सलाह से यह मामला 2017 में दिल्ली उच्च न्यायालय पहुॅंचा। इसके बाद कई अन्य महिलाएं ऐसी ही घटनाओं पर अपनी याचिका लेकर अदालत पहुॅंच गई। 

मामला इतना आसान नही था, एक तरफ थे महिलाओं के अपने तर्क जो संविधान में दी गई बराबरी की भी वकालत कर रहे थे, और उनका जोर रजामंदी से संबंध पर था। तर्क वाजिब थे जिन्हें सुना जाना भी लाज्मी था, लेकिन बहस के दौरान एक स्थिति थोड़ा असहज करने वाली तब पैदा हो गई थी जब दिल्ली हाई कोर्ट के जज जस्टिस सी हरिशंकर पत्नी की रजामंदी...पत्नी की रजामंदी ... पर जोर देने पर भड़क उठे और उन्होने एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) रेबेका जाॅन की दलील पर सख्त नाराजगी जाहिर करते हुए टिप्पणी की कि - बीवी से सेक्स की चाहत पति का अधिकार है....!  उन्होने आगे जोड़ा कि कोई इस तथ्य को अनदेखा नही कर सकता कि वैवाहिक और अवैवाहिक यौन संबंधों में अंतर होता है। उन्होने कहा: एक मामले में पुरूष के पास सेक्स की इच्छा जताने का कोई अधिकार नहीं होता क्योंकि वह विवाह बंधन से बंधे नहीं होते है जबकि दूसरे मामले में पति के पास वैवाहिक बंधन से मिला अधिकार होता है जिसके दम पर वह अपनी पार्टनर से उचित यौन संबंध बनाने की उम्मीद कर सकता है।: उन्होने यह भी कहा संसद ने पतियों को संरक्षण देने के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में वर्णित अपवाद को न्यायोचित ठहराने के लिए कुछ तार्किक आधार तो दिए ही है। 

अगर सेक्स पति की चाहत नहीं हो सकती तो डायवोर्स होने पर गुजारा भत्ता पत्नी का हक नही बनता। जाहिर है टिप्पणी काफी तल्ख थी। और कही न कहीं मूल सवाल जो रजामंदी का था उससे जुदा भी थी। यह सच है कि पति को पत्नी से सेक्स प्रात करने का हक है ऐसा ही पत्नी के साथ भी है लेकिन रजामंदी इस रिश्ते की बुनियाद में है।  

2017 से अब तक कई बार यह मामला कोर्ट में पेश हो चुका है, 2017 में जब मैरिटल रेप पर दिल्ली उच्च न्यायालय में पहली बार सुनवाई चल रही थी उस वक्त केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि मैरिटल रेप को अपराध करार नही दिया जा सकता अगर ऐसा होता है तो इससे शादी जैसी पवित्र संस्था अस्थिर हो जाएगी, साथ ही केंद्र सरकार का ये तर्क भी था कि ये पतियों को सताने के लिए आसान हथियार हो सकता है। 

हालिया सुनवाई में भी केद्र सरकार ने अपना हलफनामा दायर करते हुए कहा कि इस पर विचार विमर्श चल रहा है। इस संबंध में याचिकाकर्ता अपना सुझाव दे सकते है। साथ ही केंद्र ने अदालत को ये सूचित किया था कि मैटिल रेप को जब तक एक अपराध नही बनाया जा सकता जब तक इस मामले में संबंधित सभी पक्षों के साथ सलाह मशविरा की प्रक्रिया पूरी नही हो जाती। 

1 फरवरी 2022 को फिर बहस चली तो पक्षकार के वकील करूणा नंदी ने कहा यह पत्नी के न करने के अधिकार का सम्मान करने और यह स्वीकार करने के बारे में है कि विवाह अब सहमति को अनदेखा करने का एक सार्वभौमिक लाइसेंस नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने सरकार की ओर से पेश हुई वकील मोनिका अरोड़ा से भी सवाल किया कि क्या इस समय उनके पास 2017 में सरकार द्वारा मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की मांग के खिलाफ दाखिल हलफनामें को वापस लेने का भी कोई निर्देश है या नहीं। उन्हें बेंच ने यह भी कहा कि आप को पुख्ता जवाब के साथ वापस आने की जरूरत है। 

इस मामले में दिलचस्प मोड तब आया था जब एक पुरूष जज तरफ जस्टिस सी हरिशंकर भड़क उठे थे, दूसरी तरफ एक पुरूष अधिवक्ता राजशेखर राव जिन्हें मैरिटल रेप पर दिल्ली हाई कोर्ट की मदद के लिए न्याय मित्र बनाया गया है ने कहा कि क्या आज के समय में पत्नी को, रेप को रेप कहने के अधिकार से वंचित रखा जाए? क्या एक आदमी को अपनी पत्नी के साथ जबरदस्ती करने का अधिकार मिल जाता है ? विधायिका ये नही कहती है कि एक आदमी अपनी पत्नी पर हमला नहीं कर सकता, उसके साथ यौन शोषण नही कर सकता, लेकिन ऐसा लगता है कि एक आदमी अपनी पत्नी से रेप कर सकता है और रेप से जुड़े कानून से आसानी से बच सकता है। ये बातें न्यायमूर्ति राजीव शकधर और राजीव सी हरि शंकर की पीठ के सामने न्याय मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता राजशेखर राव ने अपनी दली पेश करते हुए कही । वैवाहिक बलात्कार के मामले में कानूनी मांग इस तरह तेज पकड़ती जा रही है।    

राष्ट्रीय परिवार स्वस्थ्य सर्वे (एनएफएचएस-5) के मुताकिब देश में अब भी 29 प्रतिशत से ज्यादा ऐसी महिलाएं है जो पति की शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करती है। ये प्रतिशत नगरीय और ग्रामीण इलाकों में अलग-अलग है। नगरों में यह प्रतिशत 24 और गावं में 32 है। 

संयुक्त राष्ट्र की प्रोग्रेस आॅफ वर्ड वुमेन 2019-20 की रिपोर्ट बताती है कि 185 देशों में सिर्फ 77 देश ऐसे है जहां मैरिटल रेप को लेकर कानून है। सबसे पहले सोवियत संघ ने 1922 में मैरिटल रेप को क्राइम घोषित किया था,1932 में पोलैंड, 1991 में ब्रिटेन और 1993 में अमेरिका ने भी मैरिटल रेप को क्राइम घोषित किया। बाकी 108 देशों में भी 74 ऐसे देश है जहां महिलाओं को अपने पति के खिलाफ रेप की शिकायत करने का अधिकार है, लेकिन भारत सहित 34 देश ऐसे है जहां मैरिटल रेप को लेकर कोई कानून नहीं है। यानि औसत बताता है कि दस में केवल चार देशों में मैरिटल रेप को अपराध माना गया है। वहीं एशिया के ज्यादातर देशों में कानून में बदलाव को लेकर कोशिशें जारी है। संयुक्त राष्ट्र की सहयोगी संस्था यूएन वोमेन के मुताबिक घर महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक जगहों में से एक है। 


भारतीय अदालतों पर एक नजर ? 

केरल हाई कोर्ट की एक अहम टिप्पणी - भारत में मैरिटल रेप को लेकर सजा का प्रावधान नही है, लेकिन इसके बावजूद ये तलाक का आधार हो सकता है। हालांकि केरल हाई कोर्ट ने भी मैरिटल रेप को अपराध मानने से इनकार कर दिया था। 

मैरिटल रेप के मामलों पर आए कोर्ट के फैसलों को देखें तो एक विरोधाभास नज़र आता हैण् जहां छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जज एन के चंद्रावंशी ने एक आदमी को अपनी ही पत्नी के बलात्कार के आरोप के मामले में बरी कर दिया थाण्

कोर्ट का कहना था कि एक पति का अपनी पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाना बलात्कार नहीं है चाहे वो दबाव में या उसकी इच्छा के बगैर बनाया गया होण्  


सुप्रीम कोर्ट की वकील राधिका थापर का कहना है कि ये संवेदनशील मुद्दा हैण् कोर्ट के समक्ष चुनौती ये है कि अगर धारा 375 ंइ कींतं 63 के अपवाद को हटा दिया जाता है तो वैवाहिक संबंधों पर असर पड़ेगाण् और ऐसा ना हो कि ऐसे मामलों की झड़ी लग जाएण्

राधिका थापर कहती हैंए श्श्शादी ऐसा संबंध है जहां एक महिला पुरुष के अधिकार होतेए एक दूसरे के प्रति ज़िम्मेदारियां होती हैंण् ऐसे में ये समानता के अधिकार का भी तो उल्लंघन करता हैण् तो सरकार को इसके बीच संतुलन बना कर एक बीच का रास्ता निकालना होगाण् लेकिन ये अपवाद हटना चाहिएण् क्योंकि कितनी ही लड़कियों की कम उम्र में शादियां होती हैं जिन्हें मैरिटल रेप के बारे में पता नहीं हो

हालांकि वे ये भी मानती हैं कि 498ए के दुरुपयोग के मामले भी सामने आते हैं लेकिन ऐसे भी मामले आते हैं जो गलत भी साबित हो जाते हैंण्


क्या कहती है बलात्कार की धारा 375 आईपीसी? 

किसी भी महिला के साथ शारीरिक संबंध को बलात्कार किस दशा में माना जाए इस बारे में धारा में 6 परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है जिनको बलात्कार की श्रीेणी में माना जाएगा। उनमें पहला है महिला की इच्छा के बिना संबंध बनाना, दूसरा महिला की सहमति के बिना संबंध तीसरा- महिला को मौत का डर, या किसी अन्य तरीके से नुकसान पहुॅंचा कर किसी और को नुकसान पहुचाने का डर दिखाकर संबंध बनाए गए हों। चैथा- अगर शादी का झांसा देकर संबंध बनाए गए हों पांच- संबंध तब बनाए गए हों जब किसी महिला की मानसिक स्थिति ठीक न हो या उसे कोई नशीला पदार्थ दिया गया हो या महिला सहमति देने के नतीजे को न समझ रही हो। छठा- महिला 15 साल से कम उम्र की हो, तो फिर उसमें उसकी मर्जी या सहमति ही क्यों न हो।  

समाधान तो निकालना ही होगा- 

जिस तरह समाज में यह मुद्दा उठा है, पीडिताओं की याचिका कोर्ट तक पहुॅंच गई ऐसे में सवाल नजरअंदाज तो नही किया जा सकता। ये पहलू भी काबिले गौर है कि अगर मैरिटल रेप के खिलाफ कोई कानून पास नही हो सकता उसमें बहुत पेंच है तो यौनिक क्रूरता के तौर पर एक क्लाॅज विशेष रूप से 49 ए में एड तो हो ही सकता है। जिससे मैरिटल रेप नाम से भी बचा जा सकता है और न्याय के लिए विशेष गाइडलाइन भी शामिल की जा सकती है। 

अब देखना ये होगा कि अगली सुनवाई में पित्रसत्ता से डरे हुए समाज की अदालत और सरकार क्या रूख अख्तियार करती है। 

NAISH HASAN

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