अपने महबूब मुसन्निफ मिर्जा हादी रूस्वा की यौम-ए-वफात पर उन्हें याद करते हुए....

 अपने महबूब मुसन्निफ मिर्जा हादी रूस्वा की यौम-ए-वफात पर उन्हें याद करते हुए....

बड़ी नौ उमरी में एक रोज घर में किताबों की आलमारी साफ करते हुए एक पतली सी किताब मिली। जिसके वरक लगभग पीले पड़ चुके थे, वरक पलटने पर वो टूट कर अलग होते जा रहे थे। काफी खस्ता हाल उस किताब की चंद लाइने पढते ही कुछ ऐसी दिलचस्पी पैदा हुई कि फिर आलमारी साफ करने का खयाल जाता रहा। बस उस किताब को खत्म करने में लग गए। वो किताब थी मिर्जा हादी रूसवा की लिखी उमराव जान अदा।

रूसवा की कलम की सहरकारी कुछ ऐसी थी कि वो हमें दीवाना बना गई। जी चाहा कि कब लखनऊ पहुंच जाएं और वो ठिकाने, वो फाटक वो उमराव का गुजरना हम अपनी नजरों में कैद कर लें। कहानी अरसे-दराज तक जेहन पर कब्जा किए रही। 

थोड़ी सी बात उमराव की करते चलें जिनके जरिए हमने रूसवा को और जानना-समझना चाहा। उमराव    जिसके बारे मे कलम चलाकर मिर्जा हादी रूसवा ने उसे रहती दुनिया तक अमर-अजर बना दिया, मिर्जा हादी रूसवा की कलम की जादूगरी ही कुछ ऐसी थी कि अमीरन उमराव जान अदा बन गई। वो मामूली सी तवायफ जो फैजाबाद के एक नौकरी पेशा वालिद की औलाद थीं, जिन्हें एक दुश्मनी के चलते पड़ोसी ने भगा कर लखनऊ के एक कोठे पर बेच दिया था, उस लखनऊ ने उन्हें इज्जत बख्शी कि आज उनका नाम हर शख्स की जबान पर मौजूद है। 

वो तारीख की एक ऐसी तवायफ रही हैं जिन पर हिंदुस्तान और पाकिस्तान में कई फिल्में बनाई जा चुकी है। वो हादी रूसवा की हम-जमानह थीं। हादी ने बहुत अरसे तक इस बात को कुबूल नहीं किया कि उनकी कहानी उमराव जान अदा एक सच्ची कहानी है, न जाने क्यों वो इस बात से इनकार करते रहे, हो सकता है उनकी कुछ जाती मजबूरियां उन्हें रोकती रही हों, लेकिन एक अरसे बाद उन्होने अपने अजीज दोस्त तमकीन से इस सच्चाई को कुबूल ही कर लिया कि यह एक सच्ची कहानी है। 

हादी रूसवा की इस कहानी के बारे में एक मर्तबा फिराक ने भी कहा था कि यह कहानी रहती दुनिया तक कायम रहेगी। 

गदर का जमाना जिसका असर पूरे अवध में गहरा रहा। जिसने फिरंगियों की अना को बिल्कुल ललकार दिया था। मार-पीट लूख-खसोट ऐसा बढ गई थी कि मानो कयामत बरपा हो गई हो। काफिले लूट लिए जाते थे, औरतों की अस्मत तार-तार कर दी जाती थी। उसी दौर में फैजाबाद की मिट्टी में पैदा हुई एक मामूली सी तवायफ जिसका असली नाम अमीरन था, वहीं किसी तरह अपना गुजर-बसर कर रही थी।  

ऐसा होता है कि कभी-कभी घना अंघेरा भी जिंदगी में एक उजाले की दस्तक दे जाता है। एक तरफ मुल्क में अफरा-तफरी का माहौल था दूसरी तरफ अमीरन की जिंदगी में कुछ ऐसा हो रहा था जो उन्हें किसी और मुकाम पर ले जाने वाला था। उसी नशेबो-फराज से गुजरते हुए अमीरन किसी तरह लखनऊ पहुंच जाती हैं। यहां उनकी मक्बूलियत में मजीब चार-चांद लग गए। लखनऊ ने उन्हें जो नाम बख्शा आज भी वो पूरी दुनिया में उसी नाम से जानी जाती है।  

उमराव अब लखनऊ की महफिलों की शान हुआ करती थी, अवध के नवाबों की जान हुआ करती थी, उनमें रक्स और गुलूकारी तो फैजाबाद में बहुत बचपन में ही रगों में पैबस्त होे गए थे, शायरी भी वो काफी अच्छी करती थीं, उनका तखल्लुस था अदा। लखनऊ ने उन्हें और तराश दिया था। उसकी महफिलों में मौसीक़ी और मुजरे का ऐसा संगम था कि देखने वाले वाह वाह करते थे। 

बेहद दिलचस्प अंदाज में लिखी ये कहानी पढने वालों को बांधे रखती है। उमराव जान नावेल को पढने के बाद ऐसा लगता है कि जितनी शिद्दत से वो शायरी में डूबी रहीं, उससे कहीं ज्यादा शिद्दत से मिर्जा ने उमराव की कहानी को वरक पर उतारा। उमराव की जो कहानी मिर्जा हादी रूसवा ने बयां की है वो तवायफों की जिंदगी में आंसुओं का जो समंदर है उनकी एक इत्तेला जरूर देती है । लेकिन उसी कहानी के जरिए एक मामूली तवायफ जो मोहब्बत में धोखा खा कर, कही गुमनाम सी हो जाती, फिर जवानी के आखरी पडाव तक आते-आते किसी अंधेरी दुनिया में समा जाती उसे मिर्जा ने रहती दुनिया तक मक्बूल बना दिया। 

आज हमारे महबूब मुसन्निफ - लेखक - की यौमे वफात का दिन है। जी चाहा कि उस दोर के अपने महबूब मुसन्निफ को याद करें बस आज उनकी ही बात करें। 

उनका शिजरा तो ईरान से मिलता है, उनके परदादा मिर्जा रशीद बेग ईरानी जो मुगलों के दौरे हुकूमत में ईरान से आकर दिल्ली में बस गए थे। दिल्ली उजड़ी तो उनका खानदान लखनऊ के चैपटियां मोहल्ले के तोपखाने में आकर रहने लगे। यहीं कूचा-ए-आफरीन खां में 1857 में मिर्जा मोहम्मद हादी रूसवा पैदा हुए। उनके वालिद आग़ा मोहम्मद तकी को पढने लिखने का बेहद शौक था, उन्हें गणित में खासी महारत हासिल थी। बस बेटा भी बाप के नक्शे कदम पर चल पड़ा। बहुत कम उम्र में ही अरबी, फारसी, उर्दू, गणित और ज्योतिष की अच्छी खासी तालीम हासिल कर ली। 

रूसवा का बुनियादी तालीम का सफर लखनऊ के सेंटीनियल काॅलेज से शुरू होकर यहीं के लामार्टीनियर्स काॅलेज तक गया। उन्होने रूडकी से इंजीनियरिंग की। रेलवे में नौकरी की। उन्हें एक रोज रसायन शास्त्र पर अरबी में लिखी एक किताब हाथ लगी, फिर वो उसमें डूबते चले गए। इससे पहले उन्होने इस मौजू पर इब्ने सीना, और अफलातून को भी पढ रखा था। अब जो कुछ भी उन्होने पढा था वो उसे करना चाहते थे। एक धुन सवार हुई उन पर और वो लखनऊ वापस आग, कोठी का सारा सामान बेच कर एक लेबोरेटरी बना डाली। 1894 में उन्होने पंजाब यूनिवर्सिटी से बीए किया अब उन्हें पीएचडी करने की धुन सवार हे गई लेहाजा वो वाशिंगटन की ओरिएंटल युनिवर्सिटी पहुंच गए। उन्होने लखनऊ के क्रिश्चियन काॅलेज और आई0टी काॅलेज में पढाया भी। हमें नहीं मालूम कि ये काॅलेज अपने एक बेहद मक्बूल छात्र को कभी याद भी करते हैं या नहीं। 

रूसवा को आप एक मल्टी टैलेंटेड इंसान कह सकते है। हिंदुुस्तानी संगीत का उन्हें खूब इल्म था, वो एक बहुत उम्दा तैराक थे। उन्हें दर्शन शास्त्र, तर्कशास्त्र, वास्तु शास्त्र, खगोल शास्त्र में भी गहरी समझ थी। अरबी, फारसी, उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी के अलावा उन्हें संस्कृत, हिब्रू, और ग्रीक जबान की भी अच्छी समझ थी। अपने आप में वो शख्स एक अनोखा इंसान था। 

कहते हैं किसी भी काम को मोकम्मल तौर पर करने के लिए एक पागलपन का होना नेहायत जरूरी होता है, मिर्जा में वो पागलपन भरपूर था, यही वजह थी कि उन्होने अपने 74 साला जिंदगी में 25 किताबें लिखी जिसमें 8 तो सिर्फ साइंस पर ही थीं। 

जहां तक शायरी का सवाल है वो तो उन्होने बहुत छोटी उम्र में ही शुरू कर दी थी। वेा गजल, नज्म, मस्नवी,मर्सिया, कतअ, कसीदा में भी महारत रखते थे। 

वो फक्कड, मस्त मौला, किताबों में डूबा रहने वाला शख्स यूं तोे बाहैसियत घराने से ताल्लुक रखता था, लेकिन उसने कमोबेश पूरी उम्र आर्थिक तंगी में गुजारी। उन्होने प्रकाशकों खास तौर पर बाबू महादेव प्रसाद की मांग पर और सिर्फ पैसों की खातिर कुछ उपन्यास भी लिखे। मसलन खूनी भेद, खूनी जोरू, बहराम की रिहाई। लेकिन जब उनकी कलम में उनके दिल की आवाज उतरी तो वो उमराव जान अदा बन के उतरी। ज़ातेशरीफ, और शरीफज़ादा जैसी नाॅवेल भी उन्होने लिखी। जो खासा पढी गई, लेकिन उन्हें भी जो माकाम उमराव ने दिलाया वो किसी दूसरी नाॅवेल ने न दिलाया। 

उनकी जाती जिंदगी में कोई कम परेशानियां नहीं थी। एक बेटी थी वो भी गुजर गई, बीवी भी जल्दी ही खुदा को प्यारी हो गई। वालिद के इंतेकाल के बाद उनकी एक चचाजाद बहन ने उनकी पुश्तैनी जायदाद पर कब्जा कर लिया, उन्हें रहने के लिए भी दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी। उनकी मोहब्बत एक फिरंगी लड़की सोफिया से बहुत गहरी हुई। कहते हैं लखनउ के महानगर इलाके में ही सोफिसा ने अपनी एक कोठी की पावर आॅफ अटार्नी रूसवा को दे दी थी, लेकिन एक रोज अपने एक रिश्तेदार की मौत की खबर पाकर सोफिसा पेरिस गई तो फिर कभी न लौटीं, रूसवा उम्र भर सोफिया का इंतेजार करते रहे। आखरी वक्त में उस्मानिया यूनिवर्सिटी हैदराबाद में एक मामूली अनुवादक के तौर पर काम रिते रहे और आज ही के दिन 21 अक्तूबर 1931 को वो जुनूनी फक्कड इंसान इस दुनिया से कूच कर गया। उनकी बक्र हैदराबाद में मौजूद है। 

मिर्जा न होते तो कौन जानता अमीरन को, कौन जानता उमराव जान अदा को। ऐसे कलमकार को हमारा लााखों सलाम। लखनऊ को अगर उमराव पर नाज है तो उससे भी कहीं ज्यादा यहां के कूचा-ए-आफरीन खां मोहल्ले में पैदा होने वाले मिर्जा हादी रूसवा पर नाज है। लखनऊ इस मोहब्बत के कलमकार कोे खिराज-ए-अकीदत पेश करता है।  

 नाइश  हसन 



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