राज सिंहासन डांवाडोल
राज सिंहासन डांवाडोल
4 सितंबर 1939 की एक शाम अली सरदार जाफरी, सिब्ते-हसन, असरारूल हक मजाज लखनऊ के एक चायखाने पर बैठे इस बात पर बहस में लगे रहे कि अंग्रेज़ अपने कुत्ते का नाम टीपू क्यों रखते हैं। तीनो इस नतीजे पर पहुंचे कि अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान से अपनी नफरत का इजहार करने के लिए यह तरीका इख्तियार किया है।
इसी मुद्दे पर अभी गुफ्तगू जारी थी कि सिब्ते हसन उठे और कहीं चले गए। करीब आधा पौन घंटे बाद लौटे तोे उनकी गोद में एक खूबसूरत सा कुत्ते का पिल्ला था। तीनों ने जिद्दन उसका नाम रखा नेल्सन। गोया अपने नजदीक अंग्रेजो से टीपू सुल्तान की तौहीन का इंतेकाम लेना इनका मक्सद था।
एक रोज मेफेयर सिनेमा हाॅल में तीनों फिल्म देखने गए, नेल्सन का भी टिकट लिया लेकिन बड़ी तकरार के बाद भी नेल्सन को अंदर नही जाने दिया गया।
ये लोग बाहर निकले, यूनिवर्सिटी के नौजवान लड़के लड़कियां सिनेमा हाॅल की तरफ जा रहे थे, ये लोग जोर-जोर से नेल्सन की बातें सब को बताने लगे। एक अंग्रेज पुलिस वाला नशे में धुत सिनेमा हाल की तरफ जाता दिखा। उसने अपने बेंत से नेल्सन को छेडा। ये तीनों नेल्सन, नेल्सन कह कर आवाजें देने लगे। नेल्सन भौकता जाता, वो अंग्रेज और गुस्से में आता जाता।
मजाज ये सब देख कर बहुत खुश हो उछल रहे थे। और बड़े मजे से गाते, बोल अरी ओ धरती बोल, राज सिंहासन डांवाडोल। वो अंग्रेज़ इन लोगों से हाथापाई करता कैसरबाग तक आ गया। नशे में धुत उस अंग्रेज की टोपी उतार कर सिब्ते हसन ने नेल्सन के सिर पर लगा दी और गोद में उसे दबाए तीनों पतली गली से यही गाते हुए निकल लिए।
किसी सियासी जमात में न होते हुए भी ये नौजनाव अंग्रेजों का हौसला किसी तरह पस्त करने में जुटे रहते।
संकलनः नाइश हसन

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