अल्विदा इमरोज





 अल्विदा इमरोज 

फिर आना इस देस.......

वो एक साया जो अरसे दराज तक नजर आता रहा, उसकी आधी पीठ, और हाथ का कुछ हिस्सा जिसमें एक कूची थी, वो झुका हुआ पेंट करता साया उनके ख्वाब में नजर आता रहा, और तकरीबन 15 साल बाद जब वो सामने आया तो हू बहू वही साया था जो ख्वाब में नजर आता रहा। वो थे इमरोज यानि इन्द्रजीत सिंह। पाकिस्तान से आया वो एक पंजाबी पेंटर जो फिर अमृता का ही हो कर रह गया। ।

तकरीबन 10 बरस पहले की बात है जब पहली बार अमृता प्रीतम की आध्यात्मिक यात्रा को जाना, कई किताबों से गुजरना हुआ, कायनात से आगे, और अनंत नाम जिज्ञासा भी उनमेे षामिल थीं इन किताबों ने अमृता की जिंदगी के कई नए वरक से रूबरू कराया। उससे पहले हमने उनके बारे में बस वही पढा था जो अमूमन सब की जबान पर रहता है। 

गौर करें तो बहुत अनोखी थी अमृता की आध्यात्मिक यात्रा। कहते हैं उनकी जिंदगी का दो तिहाई हिस्सा तो आध्यात्मिक ही रहा। जिसमें वो डूबी रहीं। इमरोज का मिलना भी उस आध्यात्मिक जीवन का हिस्सा ही बताया जाता है। 

28वें लामा का उनके घर पर यूं आ जाना, षिरडी के साई से उनका रिष्ता, अफगानिस्तान के किसी इलाके में गूरू भाई काका साई से मिलना, यह सब उन्हें ख्वाब में आता रहा। 

अमृता को ख्वाब बहुत आते थे, वो कहती थीं कि ख्वाब इतने आते हैं कि उन्हें परेषान करने लगते हैं। उसी ख्वाब से उन्होने पंचगनी में रहने वाले गुरू भाई काका साई को भी ढूंढा था, इमरोज भी उनके ख्वाबों में पहले आए फिर जिंदगी में।

आज इमरोज इस दुनिया को अल्विदा कह हमेषा के लिए अपनी अमृता के पास चले गए। उनके जाने से मानो बहुत सारे लोगों की जिंदगी में कुछ तो हुआ, उस षख्स ने मोहब्बत पर यकीन रखने वालों के दिलों में कुछ असर छोड़ा कि आज बहुत लोगों ने अपनी वाॅल पर इमरोज और अमृता का जिक्र जरूर किया। 

एक लंबे वक्त तक साथ साथ रहने और एक दूसरे में समा जाने वाले इमरोेज और अमृता का प्रेम बड़ा ही अनोखा था। 2004 में जब आज से 19 साल पहले अमृता काफी बीमार थीं तब भी उनकी ख्वाहिष थी कि जब वो आखरी सांस लें तो इमरोज उनके सरहाने बैठे हों, इमरोज तो वहां थे ही, और 2005 में उनके गुजर जाने के बाद तो उनके उस दिल्ली के मकान को उन्होने अमृता की यादों का एक म्यूजियम सा बना दिया था, हर तरफ उनकी तस्वीरें, यूुं जानिए कि उनकी तस्वीरों से उनका घर भरा रहता था। अमृता की मौजूदगी हर तरफ रहती थी। वहां जाने वालों को इमरोज अपनी अमृता की यादों से सराबोर कर देते थे। 

अमृता अपने आखरी वक्त में कह कर गई थीं कि तैनू फिर मिलांगी, आज वो मुराद पूरी हो गई, इमरोज का जिस्म खामोष होे गया और इमरोज अमृृता के पास चले गए। 

वो वक्त जब चारों तरफ नफरत ही नफरत नजर आ रही हो, ऐसे वक्त में अमृता और इमरोज को याद करना, उस लंबे षानदार साथ को याद करना जाहिर है नफरती सोच को मात दे सकता है। 

अल्विदा इमरोज 

#naish hasan 


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