जानिए मोहर्रम का इतिहास
मोहर्रम अन्याय के खिलाफ न्याय की जीत है...!
मोहर्रम इस्लामी वर्ष अर्थात हिजरी सन् का पहला महीना है। ये कोई त्योहार नही है। इस महीने की शुरूआत ही इस्लामी राज्य व्यवस्था को बचाने के लिए दी गई शहादत से हुई, उसी शहादत की स्मृति में यह दस दिन याद किए जाते है।
करबला ईराक की राजधानी बगदाद से सौ किलोमीटर दूर उत्तर पूर्व में एक छोटा सा शहर है । आज से तकरीबन 1400 साल पूर्व सन् 680 में इसी माह में यह धर्म युद्व हुआ था। पैगम्बर मोहम्मद के नाती हजरत हुसैन का यजीद पुत्र माविया जो इस्लाम मे मूल्यों के खिलाफ काम कर रहा था की फौज के हाथों कत्ल किया गया था। इस धर्म युद्व में वास्तविक जीत हजरत इमाम हुसैन की हुई पर जाहिर तौर पर जीत यजीद की थी। यजीद ने हुसैन के काफिले पर हमला बोला जिसमें हुसैन के साथ मात्र (शिया मत के अनुसार 123 लोग 72 आदमी औरतें और 51 बच्चे) शामिल थे और यजीद की फौज की संख्या 40,000 थी ।
इस हादसे को एक लेख में समेट पाना मुमकिन नही परन्तु हुसैन की शहादत की पृष्ठभूमि जानने के लिए संक्षिप्त में उस दौर के इस्लामी इतिहास को जानना जरूरी होगा।
सन् 632 में पैगम्बरे इस्लाम मुहम्मद साहब की मृत्यु के बाद चार खलीफाओं का समय आया । उस समय चुनाव का रूप बहुत कुछ हमारी लोकतान्त्रिक पंचायतों जैसा था लोग आपसी सहमति से किसी योग्य व्यक्ति को खलीफा (प्रशासनिक प्रमुख) के पद पर चुन लेते थे। आज की तरह उस चुनाव में पारिवारिक पहुॅंच या धनबल का प्रयोग नही होता था। पैगम्बर मुहम्मद के गुजरने के बाद एक के बाद एक चार खलीफ़ा अबू बकर, उमर, उस्मान और अन्तिम खलीफा के रूप में अली का चुनाव हुआ। चारों को मिलाकर खलीफाओं का समय 29 साल तक चला।
उसी दौर में हजरत अली के जो समर्थक थे वो इस बात से नाराज हुए कि हजरत अली को प्रथम खलीफा क्यों नही बनाया गया उनका तर्क था कि वो मुहम्म्द साहब के दामाद है इस लिए उन्हें ये पद मिलना चाहिए। एक तर्क में वंशवाद था एक में जनमत । वही से मुसलमानों में दो गुट उभर कर सामने आ गए। अली के समर्थकों को ही शिया कहा जाता है। इसके विपरीत सुन्नी वो है जो चारों खलीफाओं के जनमत से हुए चुनाव को सही मानते हैं। उस समय से लेकर आजतक शिया और सुन्नी के बीच यह टकराव चला आ रहा है।
शिया मुसलमान अल्पसंख्यक है। खलीफाओं का समय समाप्त होते-होते इस्लामी दुनिया में जबरदस्त बदलाव आना प्रारम्भ हुआ कबीले टूटने लगे, ताकत के बल पर बादशाह और शहंशाह नजर आने लगे जो कि इस्लामी दर्शन के खिलाफ है। इस दौरान इस्लाम धर्म ईरान , ईराक, मिस्र, सीरिया, यमन, और रोम प्रशासन के कई इलाकों तक पहुॅच गया था इस पहुॅंच के साथ ही इसका स्वरूप भी बदलता गया। अन्तिम खलीफा हजरत अली के बाद ईराक स्थित कूफा और मक्का (जिनके बीच लगभग 1900 किलोमीटर का फासला है) से दूर सीरिया के गवर्नर यजीद ने अपनी खिलाफत का एलान कर दिया था ।
यजीद की कार्यशैली बादशाहों जैसी थी जो इस्लाम के मूल्यों के खिलाफ थी उसे वहॉं की स्थानीय जनता भी पसन्द नही करती थी। दूर होने के बावजूद ईराक के लोगों का विश्वास हुसैन पर ही था स्थानीय लोग यजीद से तंग आकर अपनी रक्षा हेुतु हुसैन को बार-बार बुलावा भेजने लगे । हुसैन को यजीद की इस गलत ढंग से खिलाफत का एलान पसन्द नही आया और वे ईराक वासियों की मदद के लिए वहॉं कुछ लोगों के साथ चले गए। यजीद की फौज पहले से तैयार थी। उसने फरात नदी के किनारे हुसैन के काफिले को रोक लिया । वो एक-एक करके हुसैन के समर्थको का कत्ल करते गए अन्तिम तीन दिनों में नदी का पानी पीने पर भी रोक लगा दी । यातनाएं बढा दी और दसवी मोहर्रम को हुसैन का भी कत्ल कर दिया। तब से आज तक इस दुखद घटना का गम मनाया जाता है।
खास बात जिसे रखना यहॉ बहुत जरूरी है वो ये कि हिन्दुस्तान में इस गम को मनाने का अन्दाज थोडा अलग है। जो अन्य मुस्लिम मुल्कों में नजर नही आता। मोहर्रम में रखे जाने वाले ताजिए का इतिहास कही अन्य मुल्कों में नही मिलता। ताजियादारी विशुद्व भारतीय परम्परा है इसका इस्लाम से कोई सम्बन्ध नही है।
भारत में इसकी शुरूआत तैमूर लंग बादशाह ने की थी। वह शिया सम्प्रदाय से सम्बन्ध रखता था। तैमूर बरला वंश का तुर्की योद्वा था। उसका सपना विश्व विजय का था। फारस अफगानिस्तान मेसोपोटामिया और रूस के कुछ भागों को जीतता हुआ तैमूर भारत सन् 1398 में पहुॅंचा था। उसके साथ 98000 सैनिक भी भारत आए थे। उसने दिल्ली में महमूद तुगलक से युद्व कर यहॉं अपना ठिकाना बनाया और स्वयं को सम्राट घोषित कर दिया।
लंग तुर्की शब्द है जिसका अर्थ होता है लंगडा। वह दाएं हाथ और दाएं पैर से पंगु था। वह शिया सम्प्रदाय से था और हर साल मोहर्रम में जियारत के लिए वह ईराक जरूर जाता था। इस साल बीमारी के कारण उसे डाक्टरों व हकीमों ने सफर करने से मना कर दिया था, जिससे वह ईराक नही जा सका। बादशाह सलामत को खुश करने के लिए दरबारियों ने कुछ ऐसा करना चाहा जिससे बादशाह खुश हो जाए। उन्होने उस जमाने के कलाकारों को इकटठा कर इमाम हुसैन की कब्र की प्रतिकृति बनाने का हुक्म दिया। कुछ कलाकारों ने बांस और जरी के चमकदार वरक़ से इमाम हुसैन की कब्र की हूबहू छाया प्रति बनाकर बादशाह के महल में रखी जिसे ताज़िया नाम दिया गया।
तैमूर के दरबार के इस ताज़िए की धूम दूर-दूर तक मच गई । लोग उसकी ज़ियारत करने आने लगे । तैमूर को खुश करने के लिए अन्य रियासतों ने भी इस परम्परा को फौरन अपना लिया। विशेषकर दिल्ली व लखनऊ के आस पास स्थित नवाबों ने अपना लिया तब से लेकर आज तक यह परम्परा भारत , पाकिस्तान , बांगलादेश व बर्मा में चली आ रही है ।
शियाबहुल किसी अन्य देश में ताज़िए का कोई उल्लेख नही मिलता है। हुसैनी शहादत का सबसे शानदार रंग हिन्दुस्तान में ये है कि यहॉं बड़ी संख्या में हिन्दू भी ताजियादारी करते है, लखनऊ की मशहूर नौहानिगार सुनीता झींगरन है जो मजलिसों में नौहे मरसिये पढती है गॉंवों में हिन्दू भाइयों को मुसलमान आकर हरा धागा बॉंधतेे। यह रस्म इतनी नफरत फैलने के बाद भी उसी प्रकार चल रही है। हिन्दू-मुसलमान मिलकर मजलिसों में पूरी तरह भागीदारी करते है। हिन्दू घरों में अलम रखे जा रहे है जहॉं मुसलमान जियारत करने जा रहे है। आज के दिन हुसैन का गम मनाने वाले हिन्दुओं का हुजूम लखनऊ के चौक इलाके में देखा जा सकता है, वे मातम करते है, आग पर चलते है और या हुसैन के नारों के साथ एक साथ कर्बला जाते है।
ये है हमारा सतरंगी हिन्दुस्तान जहॉं हजार कोशिशों के बाद भी हिन्दू मुसलमान को कोई अलग नही कर सकता। ऐसा कहा जाता है कि हुसैन के समर्थकों में कुछ हिन्दुस्तानी ब्राहमण भी थे उनकी संताने आज भी उत्तर प्रदेश में हुसैनी ब्राहमण कहलाती है।
# नाइश हसन

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