खंडहर बता रहे हैं, इमारत बुलंद थी. . . . . .
खंडहर बता रहे हैं, इमारत बुलंद थी
आज हम लखनऊ की एक ऐसी अज़ीम विरासत का जिक्र करने वाले हैं जिसके बारे में जानकर आप का दिल रंजीदा जरूर होगा। जी हां सिटी स्टेशन इलाके में मौजूद इस तारीख़ी इमारत का नाम है रिफ़ा-ए-आम क्लब। रिफ़ा का मतलब है श्खुशीश् और आम का मजलब यहां श्आम आवामश् से हैं। यानि आम आवाम की खुशी के लिए बनाया गया क्लब। अब तक आप के जेहन में एक बात जरूर आ गई होगी कि क्या कोई ख़ास आवाम का भी क्लब है जहां आम लोगों के दाखिले की मनाही थी? जी आप बिल्कुल ठीक समझ रहे हैं आप, यूं तो बरतानियां निजाम ने ऐसे तमाम ठिकाने बना रखे थे जहां आम व खास किसी भी हिन्दुस्तानी को जाने की इजाज़त नहीं थी। उसी हवाले से हम आज बात कर रहे हैं रिफ़ा-ए-आम क्लब की।
सन् 1860 का वो दौर जब अंग्रेजी हुकूमत हिंदुस्तानियों को लाम पर चढाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं लगा रही थी, हिंदुस्तानियों को नफ़रत की नजर से देखा जा रहा था, 1857 में एक किस्म की शिकस्त का सामना करने के बाद अंग्रेजों का गुस्सा उबल ही रहा था। उनके मन में हिंदुस्तानियों के लिए नफरत उरूज पर थी। उसी दौर में लखनऊ में अंग्रेजों ने अपने क्लबों के बाहर तख्ती लगा दी थी कि यहां हिंदुस्तानियों का दाखिला मना है। अग्रेजों के ऐसे व्यवहार से आहत होेकर अवध के नवाब और आस-पास के जागीरदारों की मिली-जुली कोशिश से ये इमारत तामीर कराई गई थी। जिसके दरवाजे़ किसी भी खास-व-आम हिंदुस्तानी के लिए हमेशा खुले रहे।
अगर तारीखी हवाले से बात करें तो 7 अगस्त 1905 का बंग-भंग आंदोलन का जल्सा हो या मोह रूल का अहम कार्यक्रम वो इसी इमारत के जेरे साया अंजाम तक पहुंचा। 1916 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच ऐतिहासिक लखनऊ समझौते पर दस्तखत भी यहीं पर हुए।
आगे चल कर इसी इमारत में 9 अप्रैल 1936 को सज्जाद जहीर की लीडरशिप में तरक्कीपसंद कलमकारों का एक तारीखी जल्सा हुआ। जिसकी सदारत प्रेमचंद ने की थी। जिसमें सआदत हसन मंटो, फैज अहमद फैज़, रशाीद जहां, इस्मत चुंगताई, मुल्कनाथ आनंद जैसी नामवर शख़्सियत ने हिस्सा लिया।
मुंशी प्रेमचंद की यहीं पर की गई वो ऐतिहासिक तकरीर जिसे आज भी याद किया जाता है, उन्होने कहा था "साहित्य का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है, साहित्य राजनीति से आगे चलने वाली मशाल है।" उनका वो बेहद अहम भाषण अदबी और सियासी हल्के में काफी मक्बूल हुआ था।
1953 में इसी जगह पर इप्टा के जेरे परचम प्रेमचंद की लिखी कहानी ईदगाह पर एक नाटक किया गया था जिसका निर्देशन अमृतलाल नागर ने किया। उस वक्त की सरकार ने इसे रोकने का पूरी कोेशिश की थी गालेबन वो सरकार भी आज की तरह कलमकारों से डरती थी, मुखालिफ़त के बावजूद सरकार का मंसूबा कामयाब न हो सका था।
तकरीबन 150 साल की बहुत बेहतरीन तारीख समेटे ये बिल्डिंग आज अपनी आखरी सांसे गिन रही है। उसका कोई पुरसाहाल नहीं है। लखौरी ईंटों की दीवार भरभरा कर गिरने को आमादा है। जगह-जगह से दरक गई है। सरकारें आती हैं और चली जाती हैं, कई बार लोगों ने ये मुद्दा उठाया लेकिन अभी तक किसी भी सरकार ने इसे अहम काम नहीं माना लेहाजा उसके दरोदीवार टूटते बिखरते जा रहे हैं। वो जगह आज नशाखोरों का अहम ठिकाना बन चुकी है, आज चमगादडों ने इस तारीखी इमारत को अपनी पनाहगाह बना लिया है। रोज-बरोज़ कमजोर होती ये तारीखी इमारत आने जाने वालों की तरफ उदासी से देखते हुए बस यही कहती है- हम न होंगे, हमारी दास्तां होगी...।
नाइश हसन
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