किस्सा शीरमाल का . . . .

 किस्सा शीरमाल का . . . .


शीरमाल, का नाम लेते ही यक़ीनन आप के मुंह में कुछ मीठा सा घुल गया होगा। ज़ाएक़ा ऐसी चीज है जो न सिर्फ पेट को सुकून पहुंचाता है बल्कि चेहरे पर मुस्कुराहट भी ला देता है। 

इस लज़ीज़ शीरमाल की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। चलिए जानते हैं क्या है इसका सफरनामा। 

सन् 1827-1837 के बीच का दौर था जब अवध के नवाब नसीरूद्दीन हैदर ने तख्त सम्हाला था। उस वक्त उनकी उम्र महज 25 बरस थी। नवाबियत का वो आखरी पायदान था। 

नवाब खाने के बहुत शौकीन थे, नवाब के खानसामें बड़ी लज़ीज़ डिश बनाकर नवाब के सामने पेश करते थे, उन्हें लगता था कि अगर नवाब को पसंद आ गई तो उनके वारे-न्यारे हो जाएंगे। 

एक बार ईरान से महमूद नाम का एक बावर्ची कुछ रोज के लिए लखनऊ आया। उसे लखनऊ के बावर्चियों की इस बात का पता चला कि यहां बहुत पोशीदा तरीके से बावर्ची अपनी डिश पकाते हैं। उसके बारे में किसी को बताते नहीे। चूंकि महमूद एक अच्छा बावर्ची था तो उसके मन में ये खयाल आया कि क्यों न वो लखनऊ में ही ठहर कर नवाब के लिए अलग किस्म की डिश तैयार करे। 

महमूद ने लखनऊ में चैक स्थित फिरंगीमहल के बगल में एक बावर्चीखाना खोल लिया। महमूद ने सबसे पहले नहारी बनाना शुरू किया। नहारी एक तरह का शोरेबे दार गोश्त होता है जिसे सुबह खमीरी रोटी के साथ खाया जाता है। महमूद की ऐसी शोहरत बढी कि उनके बावर्चीखाने पर बड़े-बड़े रईस और शहजादे आने लगे। 

अब उसकी नहारी और खमीरी रोटी जो ईरान से यहां तशरीफ लाई थी लोगों में खासा पसंद की जाने लगी। 

एक रोज क्या देखा कि नसीरूद्दीन हैदर भी उसके यहां खाना खाने पहुंचे। ये देख महमूद का हौसला बहुत बढ़ गया। 

महमूद ने एक दिन उम्दा डिश बनाने के इरादे से शकर, मैदा और दूध और उसमें खुशबू डालकर आंटा तैयार किया। शकर की मात्रा उसमें बहुत हल्की सी, बाकी मैदा और खालिस दूध से सना आटा। जिसे तंदूर में पकाया, और तंदूर में जाने से पहले उसकी ऊपरी परत पर जाफरानी रंग लगाया, और जब रोटी पक कर तंदूर से बाहर निकली तो उस पर देशी घी खुशबू के लिए लगा दिया। इस रोटी का पेस्ट तैयार करने में महमूद ने पानी का जरा भी इस्तेमाल नहीं किया। 

रोटी काफी मुलायम मुहं  में रखते ही घुल जाती। जब नहारी के साथ ये जाफरानी रंग की रोटी पेश की जाने लगी तो उसका मजा ही अलग था। इस रोटी के अब कद्रदान बढ गए। महमूद ने इस रोटी की मुलायमियत, खुशबू और खुबसूरती देख कर इसका नाम रखा शीरमाल। तब से ये रोटी शीरमाल कहलाने लगी। 

शीरमाल पकाने का चलन सिर्फ लखनऊ में ही था। ऐसी शीरमाल कहीं और नहीं बना करती थी। महमूद की पकाई वो शीरमाल मजे़, बू-बास, नफासत, में तमाम दूसरी रोटियों से बीस पड़ी। चंद ही रोज में शीरमाल को ऐसी मक्बूलियत मिली कि वह लखनऊ की मशहूर रोटी बन गई। आज अगर किसी दावत में शीरमाल न हो वह अधूरी समझी जाती है। 

इस प्रसिद्वि के बाद तो महमूद लखनऊ के होकर रह गए। उसके गुजरने के बाद इस काम को सम्हाला उनके उत्तराधिकारी अली हुसैन ने, हुसैन के वारिस आज भी यहां इसी काम में लगे है। 

उसके बाद तो ये शीरमाल लखनऊ से चल कर पहले दूसरे सूबों में और फिर दूसरे मुल्कों अफगानिस्तान, ईरान, पाकिस्तान,तुर्की, अरब आदि मुल्कों का भी सफर कर चुकी है।  

तो ये था किस्सा शीरमाल का। अगर नवाब नसीरूद्दीन हैदर खाने के शौकीन न होते तो शायद बावर्चियों में इतना मुकाबला न होता, और मुकाबला न होता तो आज हमारे सामने इतनी लज़ीज़ रोटी शीरमाल न होती। 

नाइश  हसन 


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