अमृता का ख्वाब. . . .

 अमृता का ख्वाब

सन् 2005 का वो वक्त जब अमृता जिंदगी और मौत से जूझ रही थीं, उन्हें जिस्मानी तकलीफ बहुत थी। उस वक्त अपनी चारपाई पर लेटे-लेटे वो एक ख्वाब देखा करती थीं। मेरे बाद यह कमरा मेरा म्यूजियम बनेगा। यह किताबें यहीं रहेंगी, और मेरी चारपाई बिस्तर भी इसी तरह रहेगा। साथ वाले कमरे में इमरोज की पेंटिंग अभी की तरह लटकती रहेगी। पिछला कमरा इमरोज का रहेगा। साथ वाले कमरे में मेरी लाइब्रेरी बन जाएगी। नाम होगा श्अमृता प्रीतम दा घरश्। 

घर के सामने जो मेरे नाम की नेम प्लेट लगी है वह इसी तरह लगी रहेगी। उसके साथ इमरोज भी अपनी नेम प्लेट लगा सकता है। वो यहीं रहेगा। सभी आगंतुकों को मेरा म्यूजियम दिखाने के लिए। ऐसा कहते हुए उनके लफ़्जों में कल को न रहने का कोई खौफ न था। 

वो वक्त भी आ गया जब 31 अक्तूबर 2005 को अपने सारे ख्वाबों के साथ इमरोज को छोड़ कर अमृता इस दुनिया से रूख्सत हो गईं। 

होनी को कुछ और ही मंजूर था। उनके बेटे शैली ने फौरन ही वो सपनों का घर बेच डाला। उसे किसी से मशवरा करने की जरूरत तो थी नहीं। शैली की नजरों में इमरोज तो उसके परिवार का हिस्सा नहीं थे। 

बेटी कंदला अपने बच्चों के पास विलायत जा बसी थी। एक काबिल मां के बेटे के पास अपनी मां के लिए कोई ख्वाब न था, थी तो बस दौलत की चाह। 

इमरोज शैली से दौलत क्या मांगते उन्होने तो सारी जिंदगी अमृता के नाम कर दी थी। 

शैली ने काफी एडवांस लेकर ग्रेटर कैलाश में एक छोटा सा फलैट ले लिया। अब इमरोज उस छोटे घर में जो ग्रेटर कैलाश में था उसमें रहने लगे। शैली ने ढेर सारा रूपया जो मकान बेच कर उसे मिला था अपनी कार में भरा और वो बंबई चला गया। 

शैली की इस नई दौलत को कुछ लोगों ने देख लिया, अब लोगों की नजर शैली की दौलत पर थी, इसी दौतल के चक्कर में एक दिन शैली का मर्डर हो गया। अमृता की यादें तो लोगों के दिलों में अभी भी जिंदा और ताबिंदा हैं, शैली न मां का हुआ, न दुनिया का।

संकलनः नाइश हसन


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