किताबों से इश्क है तो अमीरूद्दौला लाइब्रेरी आइए जनाब. . . . .
किताबों से इश्क है तो अमीरूद्दौला लाइब्रेरी आइए जनाब
लखनऊ की एक बाअसर तारीख में अमीरूद्दौला लाइब्रेरी की तारीख एक खास मुक़ाम रखती है। अब न वो नवाबी दौर रहा, न वो लोग लेकिन, अमीरूद्दौला लाइब्रेरी की यह इमारत किताबों से इश्क करने वालों को अपनी तरफ बेसाख़्ता खींच लेती है।
1882 में कैसरबाग इलाके में बनी यह लाइब्रेरी उस दौर में प्रांतीय संग्रहालय का एक हिस्सा हुआ करती थी। उसके बाद 1887 में किताबों के शौकीन आम लोगों के लिए इसे खोल दिया गया। कुछ अर्से बाद एक और बदलाव इस लाइब्रेरी ने देखा और इसे 1907 में लाल बारादरी के ऊपरी हाॅल में शिफ्ट कर दिया गया। लाल बारादरी मंजिल नवाब सआदत अली खान ;1798-1814द्ध ने बनवाया था। इसमें महज तीन बरस बाद 1910 में यहां की किताबों को छोटा छत्तर मंजिल में पहुंचा दिया गया। बहर हाल इधर-उधर घूमते हुए आखिर इसे अपना स्थाई ठिकाना कैसरबाग मिल ही गया।
7 फरवरी सन् 1904 में अंजुमन हिंद के अध्यक्ष महाराजा सर प्रताम नारायण सिंह ने बोर्ड की आम सभा बुलाकर एक प्रस्ताव रखा कि राजा अमीर हसन खान को श्रद्वांजलि देने के लिए कुछ किया जाना चाहिए, वो एक विद्वान आदमी थे, शिक्षा के जरिए वो लोगों को आगे बढाया करते थे। सभा में यह बात पास हुई कि उनके सम्मान में एक लाइब्रेरी होनी चाहिए।
लाइब्रेरी के स्थान और इसके लिए धन की व्यवस्था के मक्सद से एक प्रवर समिति बनाई गई। इस समिति ने एक रिपोर्ट तैयार की और लाइब्रेरी के निर्माण के लिए 67 हजार 500 रूपये की अनुमानित राशि की सिफारिश की।
सन् 1921 में सर हरकोर्ट बटलर ने लाइब्रेरी की बुनियाद रखी। अवध के ताल्लुकेदारों ने लाइब्रेरी संयुक्त प्रांत की सरकार को तोहफे में दी थी और इसका नाम मोहम्मद अमीर हसन खान के नाम पर रखा गया था जिन्हें अमीरूद्दौला का खिताब मिला हुआ था। महाराजा सर मोहम्मद अमीर हसन खान, खानबहादुर सन 1858 से लेकर 27 जून सन् 1903 तक महमूदाबाद के राजा रहे थे।
1925 में तत्कालीन सरकार और ब्रिटिश इंडिया असोसिएशन के बीच समझौते के बाद इसका नाम अमीरूद्दौला पब्लिक लाइब्रेरी कर दिया गया।
यहां विभन्न भाषाओं की दो लाख से अधिक किताबें और आठ सौ साल से अधिक पुरानी हस्तलिखित पांडुलिपियां मौजूद हैं।
यहां तांबे की प्लेटों पर लिखे बौद्व धर्मग्रंथ धम्मपद से लेकर नवाबों के समय लिखे गए मूल नाटकों और बेहद अनूठी संस्कृत पांडुलिपियां तक उपलब्ध हैं। पांडुलिपियां संस्कृत, फारसी, अरबी,तिब्बती, पाली और बर्मी भाषा में हैं। यहां खजूर के पेड़ की पत्तियों पर लिखा बौद्व साहित्य भी मौजूद है।
पांडुलिपियों का ये दुर्लभ संकलन सिर्फ अमीरूद्दौला लाइब्रेरी में ही मिलेगा। इस लाइब्रेरी में भोजपत्र पर लिखी प्रचीन पांडुलिपियां भी सुरक्षित रखी हुई हैं।।
लाइब्रेरी में सन् 1873 के समय की टेक्सटाइल डिज़ाइनिंग से संबधित किताबें भी हैं। यहां कुछ ऐसी दुर्लभ पांडुलिपियां हैं जो लगभग 1247 के समय की हैं। यहां 272 प्राचीन संस्कृत, 8 अरबी,56 फारसी और 6 उर्दू पाडुलिपियां हैं।
यहां ताम्रपत्र पर लिखी पांडुलिपियां भी हैं जैसे ईशावास्योपनिषद- संस्कृत में 18 मंत्रों का संकलन, प्रश्नोपनिषद- हिंदू धर्म से संबंधित प्रश्नों और उत्तरों का संकलन, केनापनिषद- गद्य और पद्य में दो खंड कछोपनिषद-नचिकेता और यमराज के बीच संवादों का संकलन, जैनुद्दीन-अल-अमली द्वारा फारसी में लिखित एश-शाहुल-लामा ;इस्लाम की व्याख्याद्ध आयती बयानात, किताब-उल-तहारत और फिक़ह़ हनफी। इस तरह का यहां और भी कई दुर्लभ और प्राचीन साहित्य मौजूद है।
हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, बंगाली, संस्कृत, अरबी, फाारसी में किताबें हैं। हाल ही में सबसे पुरानी पंडुलिपियों को खत्म होने से बचाने के लिए यहां डिजिटलीकरण की शुरूआत की गई है। 2019 में शुरू हुई डिज्टिलीकरण प्रक्रिया के साथ, लगभग 24000 पुस्तकें आनलाइन उपलब्ध हो गई हैं
आप पांडुलिपियों, नक्शे और लिथोग्राफ की तलाश में हैं तो यहां तशरीफ लाएं।
इतिहास, साहित्य, विज्ञान, यात्रा, संस्कृतियों आदि पर उपलब्ध पुस्तकों का खजाना है यहां। इसमें अवध के इतिहास और संस्कृति, पुस्तकालय विज्ञान के बारे में खासी जानकारियां आप का इंतेजार कर रही है।
इसके अलावा यहां सन् 1880 की दुर्लभ प्रिंटिंग मशीने भी हैं। यहां लखनऊ के इतिहास को बयान करती तस्वीरों का भी संकलन हैं। इन तस्वीरों में वक्त के साथ बदलते लखनऊ को भी देखा जा सकता है।
हाल ही में सबसे पुरानी पंडुलिपियों को खत्म होने से बचाने के लिए यहां डिजिटलीकरण की शुरूआत की गई है। 2019 में शुरू हुई डिज्टिलीकरण प्रक्रिया के साथ, लगभग 24000 पुस्तकें आनलाइन उपलब्ध हो गई हैं
लखनऊ और दूर दराज से आने वालों के लिए यह महज एक लाइब्रेरी नहीं किताबें के प्रति अपने प्रेम को बांटने की एक नायाब जगह है। ये तीन मंजिला इमारत बहुत खूबसूरत भी है।
नाइश हसन
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